डिब्रूगढ़ में दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान ” श्री हरि कथा ” के माध्यम से प्रवाहित कर रहा धर्म रूपी गंगा
Divya Jyoti Jagrati Sansthan in Dibrugarh is spreading the Ganga of religion through "Shri Hari Katha"


दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान – जिसके संस्थापक एवं संचालक परम पूजनीय गुरूदेव सर्व श्री आशुतोष महाराज जी है – एक सामाजिक एवं आध्यात्मिक संस्था है, जो समाज को जागरूक करने हेतु विविध कार्यो में संलग्न है | समाज कल्याण कि ऐसी ही भावना से ओतप्रोत दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान, डिब्रूगढ़ शाखा द्वारा बिहू स्टेज, बंगाल गांव,डिब्रुगढ़ में तीन दिवसीय ” श्री हरि कथा ” का भव्य आयोजन किया जा रहा है, जिसका समय शाम 3 बजे से 6 बजे तक का रखा गया है | श्री हरि कथा के प्रथम दिवस में गुरुदेव सर्व श्री आशुतोष महाराज की शिष्या साध्वी ममता भारती जी ने हरि कथा के महत्व को सभी के समक्ष रखते हुए समझाया कि हरि की कथा शीतलता प्रदान करने वाली है। प्रभु की कथा श्रवण करने से तुम्हे चिरानंद प्राप्त होता है। और प्रभु भक्तों की कथा से प्रभु तक पहुँचने का मार्ग मिलता है। साध्वी जी ने संत सूरदास जी जो कि भगवान श्री कृष्ण के अनन्य भक्त है, उनके जीवन चरित्र को सभी के समक्ष रखते हुए समझाया कि सूरदास जी जिनकी नेत्र ज्योति नहीं थी, जिस कारण से उन्हें सांसारिक माता पिता का प्रेम नहीं मिला। पंरतु उन्होंने प्रभु के प्रेम को प्राप्त किया। क्योंकि सांसारिक प्रेम स्वार्थ की बैसाखी पर टिका है। जहां मानव को अपना स्वार्थ सिद्ध होता दिखाई देता है, मानव उसी से सम्बन्ध रखता हैं।
परन्तु ईश्वरीय प्रेम शाश्वत होता हैं, जो शाश्वत प्रभु से ही किया जा सकता हैं। आगे साध्वी जी ने संत सूरदास के अनेकों जीवन प्रसंगो को सभी के समक्ष रखते गए संत सूरदास जी और प्रभु कृष्ण की नटखट लीलाओ का रहस्य उद्घाटित किया। संत सूरदास जी की रचना-
” अब मैं नाच्यौ बहुत गुपाल।
काम-क्रोध कौ पहिरि चोलना, कंठ बिषय की माल॥ “
को सभी के समक्ष रखते हुए समझाया जी अधिकारों की ताल पर ही नाच रहा है और यह विकार मानव से उसकी शांति रूपी,आनंद रूपी पूंजी को लूट रहे हैं। तृष्णा का महानाद हर पल उसके घट के भीतर हो रहा हैं। किसी भक्त ने बहुत सुन्दर लिखा –
” तृष्णा ना जाए मन से,कृष्णा ना आए मन में,
कैसी लगी की नैया पार.. “
इंसान इस कृष्ण से बचना चाहता है तो उसे प्रभु के हाथों में कठपुतली बनना होगा। अपने जीवन को प्रभु की भक्ति के रंग से रंगना होगा और प्रभु की ताल और प्रभु की थाप पर ही नाचना होगा तभी हमारे जीवन की नैया पार लगा सकती है।
उन्होने सूरदास जी के जीवन वृतांत को आगे समझाते हुए कहा कि सूरदास जी की कृष्ण भक्ति उनके जीवन में पूर्ण संत श्री वल्लभाचार्य के आने के बाद ही पूर्णता को प्राप्त कर पाई। वल्लभाचार्य जी के द्वारा उन्हें दिव्य दृष्टि मिली जिसे पाकर उन्होंने भगवान श्री कृष्ण की अनेकों लीलाओं के दर्शन किए और समाज के समक्ष प्रभु की लीलाओ को रखा। आज इंसान को भी ऐसे ही दिव्य दृष्टि की आवश्यकता हैं। जिससे वो अपने भीतर प्रभु का दर्शन कर सके।
सभी क्षेत्र निवासियों ने इस ज्ञान गंगा के स्नान कर अपने मन को पवित्र किया। इस कथा में सुमधुर भजनों का गायन साध्वी सुश्री पदंप्रभा भारती जी तथा साध्वी सुश्री अभिनन्दना भारती जी ने किया| मंच संचालन साध्वी सुश्री रेखा भारती जी ने किया। प्रभु के भजनों का भक्तजनों ने बहुत लाभ उठाया और वे भी प्रभु के कीर्तन में झूमे।
