भारतीय ज्ञान को दरकिनार कर पश्चिमी अवधारणाओं को सार्वभौमिक सत्य बताया गया: धनखड़

Western concepts were declared universal truth by ignoring Indian knowledge: Dhankhar

 

नई दिल्ली, उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने भारतीय ज्ञान प्रणाली को योजनाबद्ध ढंग से दरकिनार किए जाने तथा पश्चिमी अवधारणाओं को सार्वभौमिक सत्य के रूप में प्रस्तुत करने की आलोचना करते हुए कहा है कि यह मिटाने, नष्ट करने तथा विकृत करने की योजना के तहत किया गया और दुखद बात यह है कि आजादी के बाद भी यह सिलसिला चलता रहा।श्री धनखड़ ने गुरूवार को यहां भारतीय ज्ञान प्रणाली पर पहले वार्षिक सम्मेलन में औपनिवेशिक मानसिकता से परे भारत की पहचान को पुनः स्थापित करते हुए कहा कि भारत केवल 20वीं सदी के मध्य में बना राजनीतिक राष्ट्र नहीं है, बल्कि यह चेतना, जिज्ञासा और ज्ञान की प्रवाहित नदी के रूप में एक सतत सभ्यता है।उन्होंने कहा कि भारतीय विचारों को केवल आदिम और पिछड़ेपन का प्रतीक मानकर खारिज करना केवल एक व्याख्यात्मक भूल नहीं थी। यह मिटाने, नष्ट करने और विकृत करने की योजना थी। इससे भी अधिक दुखद यह है कि स्वतंत्रता के बाद भी यह चलता रहा। उन्होंने कहा कि पश्चिमी अवधारणाओं को सार्वभौमिक सत्य के रूप में प्रस्तुत किया गया। साफ़ शब्दों में कहें तो असत्य को सत्य के रूप में सजाया गया। उन्होंने सवाल किया, “जो हमारी बुनियादी प्राथमिकता होनी चाहिए थी, वह तो विचार के दायरे में भी नहीं थी। हम अपनी मूल मान्यताओं को कैसे भूल सकते हैं?”

श्री धनखड़ ने कहा, “भारत का वैश्विक शक्ति के रूप में उदय उसकी बौद्धिक और सांस्कृतिक गरिमा के उत्थान के साथ होना चाहिए। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि ऐसा उदय ही टिकाऊ होता है और हमारी परंपराओं के अनुकूल होता है। एक राष्ट्र की शक्ति उसकी सोच की मौलिकता, मूल्यों की सामयिकता और बौद्धिक परंपरा की दृढ़ता में निहित होती है। यही सॉफ्ट पावर (सांस्कृतिक प्रभाव) है जो दीर्घकालिक होता है और आज के विश्व में अत्यंत प्रभावशाली है।”

भारत की बौद्धिक यात्रा में ऐतिहासिक व्यवधानों का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा,“इस्लामी आक्रमण ने भारतीय विद्या परंपरा में पहला व्यवधान डाला, जहां समावेशन की बजाय तिरस्कार और विध्वंस का मार्ग अपनाया गया। ब्रिटिश उपनिवेशवाद दूसरा व्यवधान लेकर आया जिसमें भारतीय ज्ञान प्रणाली को पंगु बना दिया गया, उसकी दिशा बदल दी गई। विद्या के केंद्रों का उद्देश्य बदल गया, दिशा भ्रमित हो गई। ऋषियों की भूमि बाबुओं की भूमि बन गई। ईस्ट इंडिया कंपनी को ‘ब्राउन बाबू’ चाहिए थे जबकि राष्ट्र को विचारकों की जरूरत होती है।”

उन्होंने कहा,“हमने सोचना, चिंतन करना, लेखन और दर्शन छोड़ दिया। हमने रटना, दोहराना और निगलना शुरू कर दिया। ग्रेड्स (अंक) ने चिंतनशील सोच का स्थान ले लिया। भारतीय विद्या परंपरा और उससे जुड़े संस्थानों को सुनियोजित ढंग से नष्ट किया गया।”

उपराष्ट्रपति ने भारत के विश्वविख्यात विश्वविद्यालयों का उल्लेख करते हुए कहा कि जब यूरोप के विश्वविद्यालय अस्तित्व में नहीं थे, तब भारत के तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला, वल्लभी और ओदंतपुरी ज्ञान के महान केंद्र थे। इनके विशाल पुस्तकालयों में हजारों पांडुलिपियाँ थीं। उन्होंने कहा कि इन वैश्विक विश्वविद्यालय में कोरिया, चीन, तिब्बत और फारस जैसे देशों से भी विद्यार्थी आते थे। ये ऐसे स्थल थे जहां विश्व की बुद्धिमत्ता भारत की आत्मा से आलिंगन करती थी।”

श्री धनखड़ ने ज्ञान को व्यापक रूप में समझने का आह्वान करते हुए कहा, “ज्ञान केवल ग्रंथों में नहीं होता यह समुदायों में, परंपराओं में, और पीढ़ियों से हस्तांतरित अनुभव में भी जीवित रहता है।”

उप राष्ट्रपति ने कहा कि संस्कृत, तमिल, पाली, प्राकृत आदि सभी शास्त्रीय भाषाओं के ग्रंथों के तत्काल डिजिटलीकरण की व्यवस्था की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि यह सामग्री शोधकर्ताओं और छात्रों के लिए सरलता से सुलभ होनी चाहिए।

श्री धनखड़ ने परंपरा और नवाचार के बीच संबंध की चर्चा करते हुए कहा कि अतीत की ज्ञान-परंपरा नवाचार की विरोधी नहीं बल्कि प्रेरक होती है। उन्होंने कहा कि अध्यात्म और वैज्ञानिकता साथ-साथ चल सकते हैं लेकिन इसके लिए यह जानना होगा कि अध्यात्म क्या है।

उप राष्ट्रपति ने कहा,“आज हम विभाजित और संघर्षपूर्ण विश्व से जूझ रहे हैं। ऐसे में भारत की वह ज्ञान परंपरा जो आत्मा और जगत, कर्तव्य और परिणाम, मन और पदार्थ के बीच संबंधों पर हजारों वर्षों से चिंतन करती रही है एक समावेशी, दीर्घकालिक समाधान के रूप में पुनः प्रासंगिक हो उठती है।” इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. शांतिश्री धुलीपुडी पंडित, प्रो. एम.एस. चैत्र, प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय टोली सदस्य तथा अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

 

 

 

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