विपक्ष की मांग के अनुरुप मानसून सत्र में सरकार ला सकती है जातीय जनगणना बिल

As per the demand of the opposition, the government can bring the caste census bill in the monsoon session

 

नई दिल्ली, केंद्र सरकार 2026 से जनगणना, जातीय जनगणना, परिसीमन, और महिला आरक्षण की प्रक्रिया को एकसाथ लागू करने की तैयारी में है। इसके लिए जरूरी विधायी प्रक्रियाएं मानसून सत्र से शुरू होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। इससे देश की राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक संरचना में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

सरकार जनगणना अधिनियम 1948 में संशोधन लाकर जातीय गिनती को वैधानिक रूप देने जा रही है। इससे जुड़ा विधेयक मानसून सत्र में पेश हो सकता है। यह कदम विपक्षी दलों की लंबे समय से चली आ रही मांग के अनुरूप है, जो सामाजिक न्याय की नीतियों के लिए विस्तृत डेटा की मांग कर रहे हैं।

जनगणना और परिसीमन की साझा टाइमलाइन जानकारी अनुसार जनगणना की प्रक्रिया 1 अप्रैल 2026 से शुरू होगी, लेकिन इसके लिए दो शर्तें जरूरी होंगी। पहली प्रशासनिक सीमाओं को फ्रीज करना – अब यह सीमा 31 दिसंबर 2025 तक बढ़ा दी गई है। दूसरी विधायी संशोधन – जातीय गणना के लिए कानून में संशोधन आवश्यक होगा।परिसीमन आयोग का गठन भी 2026 में होगा, जो नए जनसंख्या आंकड़ों के आधार पर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाएं तय करेगा। इससे संसद और राज्यों में सीटों की संख्या और आरक्षण की स्थिति प्रभावित होगी।

महिला आरक्षण की प्रक्रिया भी जुड़ेगी महिला आरक्षण अधिनियम, जो 20 सितंबर 2023 को पारित हुआ था, के प्रावधान भी 2026 के जनगणना और परिसीमन के बाद ही लागू होंगे। यानी, तब जाकर महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें तय की जा सकेंगी।

लागत और प्रक्रिया का अनुमान

जनगणना पर अनुमानित खर्च: 14,000 करोड़ रुपये

प्रति नागरिक खर्च: लगभग ₹100

2019 में पहले ही मंजूर राशि: 8,754 करोड़ रु. (जनगणना) प्लस 3,941 करोड़ रु. (एनपीआर)

प्रक्रिया की कुल समयावधि: जनगणना और परिसीमन मिलाकर 5-6 साल

पृष्ठभूमि और राजनीतिक महत्त्व

भारत में आखिरी बार जातीय जनगणना 1931 में ब्रिटिश शासन में हुई थी। 2011 में भी जाति आधारित डेटा जुटाया गया था, लेकिन सार्वजनिक नहीं किया गया। अब 95 वर्षों के बाद यह प्रक्रिया फिर से खुले तौर पर हो सकती है।

 

 

 

You might also like