फेफड़ों के कैंसर मरीजों के लिए शुरुआती पहचान और आधुनिक उपचार विकल्प नई उम्मीद

Early detection and modern treatment options for lung cancer patients new hope

पानीपत, संजीव त्यागी
स्वस्थ फेफड़े हमारे संपूर्ण स्वास्थ्य की नींव हैं, लेकिन अक्सर हम तब तक इनके बारे में नहीं सोचते जब तक इनमें कोई समस्या न हो जाए। शरीर की हर क्रिया—ऑक्सीजन पहुंचाने से लेकर कोशिकाओं को ऊर्जा देने तक—हमारे फेफड़ों पर निर्भर करती है। लेकिन बढ़ते प्रदूषण, अस्वस्थ जीवनशैली और तंबाकू की लत ने भारत में फेफड़ों के स्वास्थ्य को उपेक्षित कर दिया है।

*मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, शालीमार बाग के पल्मोनोलॉजी विभाग के सीनियर डायरेक्टर डॉ. इंदर मोहन चुग ने बताया कि* “पिछले एक दशक में भारत में अस्थमा, सीओपीडी (क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज) और बार-बार होने वाले फेफड़ों के संक्रमण जैसे रोगों में तेजी से वृद्धि हुई है। अकेला वायु प्रदूषण एक “साइलेंट किलर” बन चुका है, जो दुनियाभर में असमय मौतों का कारण बन रहा है। खासकर शहरी भारत में खराब हवा की गुणवत्ता सीधे तौर पर फेफड़ों की क्षमता घटा रही है, बार-बार होने वाली सांस की बीमारियों को बढ़ा रही है और पुरानी बीमारियों को और बिगाड़ रही है। दुर्भाग्य से, अब नॉन-स्मोकर्स भी सुरक्षित नहीं हैं। पैसिव स्मोकिंग और प्रदूषित वातावरण ने फेफड़ों की बीमारियों का खतरा पहले से कहीं ज्यादा बढ़ा दिया है।“

धूम्रपान अब भी फेफड़ों की बीमारियों और फेफड़ों के कैंसर का सबसे बड़ा जोखिम कारक है। लेकिन अक्सर इस तथ्य को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है कि पैसिव स्मोकिंग करने वाले और यहां तक कि वे लोग जिनका धूम्रपान से कोई संबंध नहीं है, वे भी फेफड़ों के कैंसर और अन्य श्वसन रोगों की चपेट में आ रहे हैं। इसका मुख्य कारण सेकेंड-हैंड स्मोक, जहरीले पर्यावरणीय कारक और कार्यस्थल पर मौजूद खतरनाक पदार्थ जैसे ऐसबेस्टस या डीज़ल का धुआं है।

जनता के लिए सबसे अहम संदेश यही है कि शुरुआती चेतावनी संकेतों को नजरअंदाज न करें। लगातार खांसी, बिना वजह सांस फूलना, सीटी जैसी आवाज (व्हीज़िंग), सीने में दर्द या बार-बार संक्रमण जैसे लक्षण तुरंत डॉक्टर से परामर्श लेने की मांग करते हैं। समय पर की गई जांचें, जैसे फेफड़ों की कार्यक्षमता की जांच या इमेजिंग, बीमारियों का जल्दी पता लगाने, जटिलताओं से बचाव और बेहतर परिणाम सुनिश्चित करने में मदद करती हैं।

फेफड़ों की बीमारियों से बचाव हमेशा जटिल उपायों से नहीं होता। छोटे-छोटे लेकिन निरंतर जीवनशैली में बदलाव बड़ा फर्क ला सकते हैं। सभी प्रकार के तंबाकू का सेवन छोड़ना, प्रदूषित जगहों पर मास्क पहनना, फ्लू और निमोनिया के टीकाकरण कराना, सक्रिय जीवनशैली अपनाना और पौष्टिक आहार लेना—ये सभी सरल लेकिन प्रभावी कदम हैं जो फेफड़ों को स्वस्थ बनाए रखते हैं।

*मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, शालीमार बागके मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के एसोसिएट डायरेक्टर डॉ. वसीम अब्बास ने बताया कि* “जहां तक कैंसर का सवाल है, जागरूकता और भी जरूरी हो जाती है। शुरुआती पहचान जीवन रक्षक साबित हो सकती है। खासकर उच्च जोखिम वाले समूह—लंबे समय से धूम्रपान करने वाले या फेफड़ों के कैंसर का पारिवारिक इतिहास रखने वाले—यदि लो-डोज सीटी स्कैन जैसी जांच कराएं तो समय रहते निदान हो सकता है। आज चिकित्सा विज्ञान ने लंबी छलांग लगाई है और हमारे पास टारगेटेड थेरेपी और इम्यूनोथेरेपी जैसे उन्नत उपचार उपलब्ध हैं। ये न केवल जीवन दर (सर्वाइवल रेट) को बेहतर बनाते हैं, बल्कि मरीजों को पारंपरिक कीमोथेरेपी की तुलना में बेहतर जीवन गुणवत्ता और कम दुष्प्रभाव प्रदान करते हैं।“

फेफड़ों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए दोहरा दृष्टिकोण जरूरी है—बचाव और समय पर जागरूकता। जहां एक ओर तंबाकू से दूरी, प्रदूषण से बचाव और स्वस्थ आदतों को अपनाना अहम है, वहीं शुरुआती लक्षणों को पहचानना और नियमित जांच करवाना अनगिनत जीवन बचा सकता है। आधुनिक उपचार, शुरुआती हस्तक्षेप और बढ़ती जागरूकता के साथ हम भारत में फेफड़ों की बीमारियों और फेफड़ों के कैंसर का बोझ कम कर सकते हैं।

इस वर्ल्ड लंग डे पर हमें संकल्प लेना चाहिए कि फेफड़ों के स्वास्थ्य को प्राथमिकता देंगे, न कि बाद में सोचने वाली बात। सहज सांस लेना कभी हल्के में नहीं लेना चाहिए—हर सांस हमें याद दिलाती है कि फेफड़ों की सुरक्षा कितनी जरूरी है।

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