40 की उम्र के बाद जोड़ों की सेहत: डा. थामस

Joint health after the age of 40: Dr. Thomas

-छोटी आदतें जो गठिया के खतरे को कम करने में कर सकती हैं मदद

पानीपत (संजीव त्यागी)
40 की उम्र के बाद जोड़ों में दर्द, अकड़न या असहजता को अक्सर उम्र बढ़ने का सामान्य हिस्सा मान लिया जाता है। हालांकि बढ़ती उम्र के साथ शरीर में कुछ प्राकृतिक बदलाव जरूर आते हैं, लेकिन जोड़ों की सेहत केवल उम्र पर निर्भर नहीं करती। हमारी रोजमर्रा की आदतें, शारीरिक गतिविधि, पोषण, सही पॉश्चर और जीवनशैली लंबे समय में जोड़ों की कार्यक्षमता को प्रभावित करते हैं। अच्छी बात यह है कि छोटी लेकिन नियमित स्वस्थ आदतें अपनाकर जोड़ों पर अनावश्यक दबाव कम किया जा सकता है और भविष्य में गठिया या गतिशीलता से जुड़ी समस्याओं के जोखिम को घटाने में मदद मिल सकती है।

उम्र बढ़ने के साथ शरीर में लचीलापन कम होना, टिशूस की मरम्मत की प्रक्रिया धीमी पड़ना, कार्टिलेज का घिसाव और जोड़ों को सहारा देने वाली मांसपेशियों की ताकत कम होना जैसी स्थितियां विकसित हो सकती हैं। 40 के बाद शरीर को शारीरिक तनाव से उबरने में अधिक समय लग सकता है। ऐसे में लंबे समय तक बैठना, गलत तरीके से चलना-फिरना या खराब पॉश्चर जैसी आदतें घुटनों, कूल्हों, कंधों और पीठ पर अधिक असर डाल सकती हैं। हालांकि केवल उम्र बढ़ना जोड़ों की स्थिति तय नहीं करता, बल्कि दैनिक जीवन की आदतें भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, शालीमार बाग के रोबोटिक जॉइंट रिप्लेसमेंट्स एवं ऑर्थोपेडिक्स विभाग के सीनियर डायरेक्टर, डॉ. साइमन थॉमस ने बताया “दिनभर सक्रिय रहना जोड़ों को स्वस्थ बनाए रखने के लिए जरूरी है। लंबे समय तक बैठे रहने से जोड़ों की चिकनाई कम हो सकती है, मांसपेशियां सख्त हो सकती हैं और लचीलापन घट सकता है। नियमित रूप से थोड़ी देर चलना, स्ट्रेचिंग करना, सीढ़ियों का इस्तेमाल करना और लंबे समय तक एक ही स्थिति में न रहना जोड़ों को गतिशील बनाए रखने में मदद करता है।

डॉ. साइमन ने आगे बताया “कुछ दोहराव वाली गतिविधियां, जैसे बार-बार झुकना, गलत तरीके से वजन उठाना या लंबे समय तक एक ही प्रकार का शारीरिक तनाव, समय के साथ जोड़ों को नुकसान पहुंचा सकता है। ऐसे में सही तकनीक अपनाना और बीच-बीच में आराम करना जरूरी है। इसके साथ ही संतुलित आहार भी हड्डियों, मांसपेशियों और जोड़ों के आसपास के टिशूस को स्वस्थ रखने में मदद करता है। प्रोटीन, कैल्शियम, विटामिन D, ओमेगा-3 फैटी एसिड, ताजे फल-सब्जियां और पर्याप्त पानी शरीर की मस्कुलोस्केलेटल सेहत के लिए महत्वपूर्ण हैं। तनाव भी जोड़ों की परेशानी बढ़ा सकता है क्योंकि कई लोग अनजाने में गर्दन, कंधों या पीठ की मांसपेशियों में तनाव बनाए रखते हैं।

40 की उम्र के बाद जोड़ों का घिसाव धीरे-धीरे विकसित होता है, इसलिए रोकथाम पर ध्यान देना बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। रोजमर्रा की छोटी लेकिन लगातार अपनाई गई स्वस्थ आदतें लंबे समय में जोड़ों की सेहत, गतिशीलता और स्वतंत्र जीवनशैली को बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं। जोड़ों की देखभाल केवल दर्द से बचने के लिए नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों तक आरामदायक और सक्रिय जीवन जीने के लिए एक जरूरी निवेश है।

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