” करवाचौथ पर विशेष ” 

"Special on Karva Chauth"

 

 

  ” करवाचौथ “
देश है हमारा त्यौहारों से भरपूर,
देश है हमारा व्रतों से भरपूर।
शिवरात्रि ,जन्माष्टमी है जैसे,
सावन के सोमवार हैं जैसे।
हर एकादशी का अपना महत्व,
कृष्ण पक्ष चौथ का अपना महत्व।
किंतु है सर्वोपरी कार्तिक की चौथ,
जिसमें सुहागिनें होवे
श्रृंगार से सराबोर।
पहले ही दिन  लग जाती मेंहदी हाथों में,
कितनी उमंग होती सब साथिनों में ।
गणेश पूजा मानी जाती है उत्तम,
सरगी की रीति भी होती है उत्तम।
करवा का अर्थ है माटी की लोटी ,
पंचभूत के तत्वों से मिली जो होती ।
इंतजार है चांद का ,
तब तक पेट रहता है खाली ।
चांद को अरग दे, पिया के हाथों पीती पानी ।
इसी काम में आती लोटी,
पति पत्नी का प्रेम पनपती।
हमें जो सिखाया गया ,
वह आपको बताती हूं।
अरग दो चंद्रमा को तो,
निकालो सूत अपने वस्त्र से और चढाओ चंद्रमा को यह कहते हुए——
“सोन की सांकली, गल मोत्यां को हार,
चंद्रमा न अरग देवां
जीवो वीर भरतार।”
अतः भाई व पति,
कामना दोनों के दीर्घायु की व्रत में चौथ के समायी है।
पति अपनी  जगह है
और खास जगह भाई है।
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