“अमानत एक यात्री की थी, भरोसा करोड़ों का लौटा”
"The trust belonged to a traveler, the trust of crores was returned"
वर्दी उतर गई, लेकिन सेवा की ड्यूटी आज भी जारी है—राकेश कुमार शर्मा की 1,982 अमानतों की असाधारण कहानी
“उन्होंने केवल खोया हुआ सामान नहीं लौटाया,
बल्कि हर अमानत के साथ एक परिवार की चिंता दूर की और भारतीय रेलवे पर विश्वास की एक नई कड़ी जोड़ी।”

नई दिल्ली।
आज के दौर में किसी अनजान व्यक्ति का फोन आना अपने आप में चिंता का विषय बन गया है।
“कौन बोल रहा है?”
“आपको मेरा नंबर कहाँ से मिला?”
“क्या आप वास्तव में रेलवे से बोल रहे हैं?”
स्पैम कॉल, फर्जी कॉल और साइबर ठगी के बढ़ते मामलों ने लोगों को इतना सतर्क कर दिया है कि किसी अनजान व्यक्ति पर तुरंत विश्वास करना आसान नहीं रहा। ऐसे समय में यदि किसी यात्री को फोन करके कोई कहे—“मैं रेलवे से बोल रहा हूँ” या “मैं सेवानिवृत्त स्टेशन मैनेजर राकेश कुमार शर्मा बोल रहा हूँ”, तो सामने वाला तुरंत विश्वास नहीं करता। उसे विश्वास दिलाना पड़ता है।
यहीं से शुरू होती है राकेश कुमार शर्मा की वह सेवा-यात्रा, जो दर्ज 1,982 Lost & Found मामलों से कहीं अधिक व्यापक है।
वर्ष 1998 में उनकी तैनाती नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर हुई। वर्ष 1998 से 2016 के बीच भी उन्होंने अनेक यात्रियों की खोई हुई अमानतें लौटाने में सहायता की, लेकिन उस समय इस सेवा का व्यवस्थित रिकॉर्ड नहीं रखा जाता था। 06 अप्रैल 2016 से उन्होंने लौटाई गई अमानतों का प्रमाणिक विवरण रखना शुरू किया। इसलिए उपलब्ध 1,982 का आंकड़ा केवल उसी अवधि का है, जिसका रिकॉर्ड सुरक्षित है; वास्तविक सेवा इससे कहीं अधिक रही होगी।
इन 1,982 मामलों में 06 अप्रैल 2016 से सेवा-काल के दौरान लौटाई गई 1,963 अमानतें और 31 जनवरी 2026 को सेवानिवृत्ति के बाद लौटाई गई 19 अमानतें शामिल हैं। इनमें 18 देशों के 42 विदेशी यात्रियों की अमानतें भी थीं। लौटाई गई वस्तुओं का अनुमानित मूल्य ₹5 करोड़ से अधिक है। हालांकि इस सेवा का वास्तविक मूल्य केवल रुपयों में नहीं मापा जा सकता, क्योंकि किसी व्यक्ति के लिए ₹500 की वस्तु भी अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकती है और पासपोर्ट, आवश्यक दस्तावेज या यादों से भरा मोबाइल कई बार अनमोल होता है।
हर मामले के पीछे केवल एक वस्तु नहीं, बल्कि एक पूरी कहानी होती थी। किसी यात्री का मोबाइल ट्रेन में छूट गया, किसी का लैपटॉप, किसी का बैग, पासपोर्ट, नकदी या आवश्यक दस्तावेज। किसी सामान में नौकरी और व्यवसाय से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी होती थी, तो किसी में परिवार की वर्षों पुरानी यादें। किसी यात्री की अमानत लौटाना वास्तव में उसके माता-पिता, जीवनसाथी, बच्चों और पूरे परिवार की चिंता कम करना था।
एक मामला सुलझाने के लिए कई स्तरों पर प्रयास करने पड़ते थे। सामान में मिले सुरागों के आधार पर यात्री की पहचान तलाशनी पड़ती थी। टिकट या PNR के माध्यम से संपर्क का रास्ता निकालना पड़ता था। कर्मचारियों और अधिकारियों से जानकारी लेनी पड़ती थी। यात्री को फोन करना पड़ता था और संपर्क न होने पर उसके परिवार तक पहुँचना पड़ता था। कभी नंबर बंद मिलता, कभी यात्री फोन नहीं उठाता और कभी सामने वाला कॉल को स्पैम या ठगी समझ लेता। ऐसे में अमानत लौटाने से पहले विश्वास कायम करना पड़ता था।
इसलिए 1,982 मामलों के पीछे किए गए वास्तविक प्रयासों की संख्या इससे कई गुना अधिक रही। हजारों फोन कॉल, अनेक लोगों से संपर्क, बार-बार समझाना, कई दिनों तक लगातार प्रयास और हर स्तर पर सहयोग—इन सबके बाद कोई अमानत अपने वास्तविक मालिक तक पहुँचती थी। हर लौटाई गई वस्तु के पीछे एक पूरी टीम, अनेक संपर्क और सबसे बढ़कर हार न मानने की दृढ़ इच्छाशक्ति होती थी।
इस सेवा का प्रभाव केवल यात्री तक सीमित नहीं रहता था। जब कोई यात्री अपने परिवार से कहता—“रेलवे में किसी ने मेरी मदद की और मेरा सामान वापस मिल गया”, तो वह अनुभव परिवार, रिश्तेदारों और मित्रों तक पहुँचता। एक सकारात्मक अनुभव दूसरे लोगों में विश्वास पैदा करता और इस तरह एक छोटी-सी मानवीय पहल भारतीय रेलवे के प्रति भरोसे की नई कड़ी जोड़ती चली जाती।
लगभग 36 वर्षों की रेल सेवा में श्री शर्मा को विभिन्न स्तरों पर अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए। इनमें मंडल रेल प्रबंधक पुरस्कार, मुख्य परिचालन प्रबंधक पुरस्कार, महाप्रबंधक पुरस्कार, रेलवे बोर्ड के सदस्यों द्वारा प्रदान किए गए नकद पुरस्कार, रेल राज्य मंत्री द्वारा प्रदान किया गया नकद पुरस्कार, अपर महाप्रबंधक पुरस्कार और यात्री सुविधा पुरस्कार सहित अनेक सम्मान शामिल हैं।
उनकी सेवा-यात्रा का विशेष पड़ाव 15 दिसंबर 2023 रहा, जब उन्हें रेल मंत्रालय, भारत सरकार का अति विशिष्ट रेल सेवा पुरस्कार–2023 तत्कालीन रेल मंत्री श्री अश्विनी वैष्णव द्वारा प्रदान किया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें समाज रत्न पुरस्कार, एनबीटी प्रेरणादीप पुरस्कार, राष्ट्रीय गौरव सम्मान, मार्तंड पुरस्कार, प्रशंसा-पत्र तथा विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाओं के अनेक सम्मान प्राप्त हुए। उनकी सेवा को इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स 2026 और एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स 2026 में भी मान्यता मिली। एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स का ‘ग्रैंड मास्टर’ सम्मान इस यात्रा का विशेष गौरव है।
फिर भी उनके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार कोई ट्रॉफी या प्रमाण-पत्र नहीं, बल्कि किसी यात्री की आवाज में सुनाई देने वाली राहत थी।
31 जनवरी 2026 को श्री राकेश कुमार शर्मा रेलवे की नियमित सेवा से सेवानिवृत्त हो गए। पद समाप्त हुआ, वर्दी उतर गई और ड्यूटी का समय समाप्त हो गया, लेकिन सेवा की भावना समाप्त नहीं हुई। सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्होंने 19 यात्रियों की अमानतें उनके वास्तविक मालिकों तक पहुँचाने में योगदान दिया।
राकेश कुमार शर्मा की कहानी केवल 1,982 मामलों की कहानी नहीं है। यह हजारों फोन कॉल, अनेक संपर्कों, बार-बार किए गए प्रयासों और यात्रियों की परेशानी को अपनी जिम्मेदारी समझने की कहानी है। यह उस विश्वास की कहानी है, जो एक यात्री से उसके परिवार, परिवार से रिश्तेदारों, रिश्तेदारों से मित्रों और फिर समाज तक पहुँचता है।
उन्होंने केवल Lost & Found का रिकॉर्ड नहीं बनाया। उन्होंने यह सिद्ध किया कि सरकारी सेवा की सबसे बड़ी पहचान पद नहीं, बल्कि वह विश्वास है जो एक कर्मचारी अपने पीछे छोड़ जाता है।
अमानत एक यात्री की थी, राहत एक परिवार की थी, कहानी हजारों लोगों तक पहुँची और विश्वास करोड़ों का मजबूत हुआ।
आज वे रेलवे की वर्दी में नहीं हैं, लेकिन जब किसी यात्री की खोई हुई अमानत उसके हाथ में वापस आती है और उसके चेहरे पर राहत दिखाई देती है, तब लगता है—
**वर्दी भले ही उतर गई हो,
लेकिन सेवा की ड्यूटी अभी भी जारी है।**
नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के इस कर्मयोगी को शत-शत नमन।
