भागवत गीता और नेतृत्व

Bhagwat Gita and Leadership

प्रोफेसर संजय रॉय

भागवत गीता के 700 श्लोकों में प्रत्येक श्लोक नेतृत्व (लीडरशिप) के गुणों को विकसित करने की क्षमता रखता है। नेतृत्व का सबसे महत्वपूर्ण पहलू अनुशासन है। दूसरे शब्दों में, अनुशासन ही नेतृत्व का मूलभूत आधार है। लेकिन अनुशासन और नेतृत्व, दोनों के सामने अवसाद (डिप्रेशन) एक बड़ी चुनौती बनकर आता है।

जब व्यक्ति अपनी उपलब्धियों पर ध्यान देने के बजाय उन चीज़ों की चिंता करता है जो उसके पास नहीं हैं, तो वह अवसाद के पहले चरण में प्रवेश करता है। जैसे-जैसे वह उन अनुपस्थित वस्तुओं के बारे में सोचता रहता है, अवसाद की गहराई में जाने लगता है। नकारात्मक सोच नेतृत्व का सबसे बड़ा शत्रु होती है। अतः व्यक्ति को अपने नेतृत्व कौशल को सदैव जागरूक रखना चाहिए ताकि वह आत्मबल और सकारात्मकता को बनाए रख सके।

नेतृत्व के सिद्धांत

भागवत गीता के तीसरे अध्याय का 21वां श्लोक नेतृत्व को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है:

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।

स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ 21 ॥”

अर्थात् – “श्रेष्ठ पुरुष जो आचरण करता है, अन्य व्यक्ति उसी का अनुसरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण स्थापित करता है, समाज उसी के अनुरूप व्यवहार करता है।”

इसलिए, बड़े व्यक्तियों का आचरण अनुकरणीय होना चाहिए। गीता में इस संदर्भ में पाँच गुणों का उल्लेख किया गया है, जो न केवल व्यक्ति के जीवन को श्रेष्ठ बनाते हैं, बल्कि अन्य लोगों को प्रेरित करने की क्षमता भी रखते हैं। ये मुख्यतः 5 गुणों को निर्देशित करता है तप (संयम और अनुशास), कपट रहित होना (सत्यनिष्ठा), सत्यनिष्ठा (इमानदारी), निःस्वार्थ भाव (स्वार्थ से मुक्त होना), और परहित (समाज सेवा का भाव).

प्रथम गुण के अनुसार तपस्वी वही हो सकता है, जिसका जीवन अनुशासन पर आधारित हो। अनुशासन तीन स्तंभों पर टिका होता है – नियम, समयबद्धता, और आज्ञा पालन। जो व्यक्ति इन तीनों का पालन करता है, वही एक अच्छा नेता बन सकता है। अनुशासन का महत्व गीता के द्वितीय अध्याय के 14वें श्लोक में समझाया गया है:

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।

आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥ 14 ॥”

अर्थात् – “हे कुंतीपुत्र! इंद्रियों और उनके विषयों के संपर्क से उत्पन्न सुख-दुख क्षणिक हैं। वे ऋतुओं के समान आते-जाते रहते हैं। हे भरतवंशी! मनुष्य को चाहिए कि वह इनसे विचलित न होकर सहनशील बने।”

इसलिए, एक नेता को सदा सहनशीलता (तितिक्षस्वता) का पालन करना चाहिए। परिस्थितियाँ सदैव बदलती रहती हैं, लेकिन एक नेता को अपने अनुशासन और धैर्य को बनाए रखना आवश्यक है।

द्वितीय गुण के अनुसार, लीडर को सत्यनिष्ठ होना चाहिए क्योंकि कपट से अर्जित सफलता क्षणिक होती है। जो नेता सत्य के मार्ग पर चलता है, वही लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बन सकता है। अतः एक नेता को सम दृष्टि रखनी चाहिए, यानी सभी को समान दृष्टि से देखना चाहिए। शिकायत नहीं करनी चाहिए; एक सच्चा नेता विफलता की ज़िम्मेदारी स्वयं लेता है और सफलता का श्रेय अपनी टीम को देता है। उदाहरण के लिए, जब भारत का पहला रॉकेट प्रक्षेपण विफल हुआ, तो सतीश धवन (ISRO के निदेशक) ने असफलता की पूरी ज़िम्मेदारी स्वयं ली। लेकिन जब अगला प्रयास सफल हुआ, तो उन्होंने ए.पी.जे. अब्दुल कलाम को मीडिया के सामने भेजा ताकि पूरी टीम को श्रेय मिल सके। यही एक सच्चे नेता का गुण होता है।

तृतीय गुण के अनुसार गीता सिखाती है कि अनुकूल परिस्थितियाँ भी खतरनाक हो सकती हैं। जब व्यक्ति बहुत अधिक सुख-सुविधा में होता है, तो वह आलसी और स्वार्थी बन सकता है। इसलिए, एक नेता को हमेशा सतर्क रहना चाहिए। उदाहरन के लिए COVID-19 महामारी के दौरान भारत ने संकट की घड़ी में न केवल अपने देश के लिए, बल्कि पूरी दुनिया के लिएमास्क, वैक्सीन और चिकित्सा उपकरणों का निर्माण किया। यह एक सशक्त नेतृत्व का उदाहरण है।

चतुर्थ गुण के अनुसार नेतृत्व सिर्फ व्यक्तिगत गुणों पर निर्भर नहीं करता, बल्कि सामूहिक सहयोग पर आधारित होता है। यदि परिवार और समाज में स्वार्थ की भावना बढ़ती है, तो भय और क्रोध जन्म लेते हैं, जो नेतृत्व को कमजोर कर देते हैं। गीता के अनुसार, ‘मैंकी जगह हमको प्राथमिकता देनी चाहिए। यही विचार अहम् (मैं) और वयं (हम) के बीच का अंतर स्पष्ट करता है।

पंचम गुण भाव और प्रेरणा को मजबूत करने के सन्दर्भ में है. गीता में कृष्ण और अर्जुन के संवाद से नेतृत्व की सबसे महत्वपूर्ण सीख मिलती है।उदहारण के लिए जब युद्ध के मैदान में अर्जुन निराश हो गए और लड़ने से मना कर दिया, तब भगवान कृष्ण ने धैर्य और मुस्कान के साथ उन्हें प्रेरित किया। यही नेतृत्व का सबसे बड़ा गुण है – विपरीत परिस्थितियों में भी सकारात्मक ऊर्जा बनाए रखना।

 

निष्कर्ष

भागवत गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि नेतृत्व का एक मार्गदर्शक भी है। गीता हमें सिखाती है कि एक सच्चा नेता वही है जो: अनुशासित हो (तप), सत्यनिष्ठ और ईमानदार हो, अनुकूल और प्रतिकूल दोनों परिस्थितियों में समान रूप से धैर्य रखे, व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज की भलाई के लिए कार्य करे, और दूसरों को प्रेरित करने की क्षमता रखे. अतः लीडरशिप केवल पद या शक्ति का नाम नहीं है, यह एक जिम्मेदारी है, जो अनुशासन, सत्य, सेवा और सहनशीलता से ही निभाई जा सकती है।

(डॉ. संजीव कुमार: श्यामा प्रसाद मुखर्जी महाविद्यालय, दिल्लीविश्वविद्यालय में राजनीती विज्ञानं के सहायक प्रोफेसर है और एस. एच. डी. रिसर्च फाउंडेशन के निदेक्षक हैं. Mb:9718640333

sanjeev.spmcollege@gmail.com)

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प्रोफेसर संजय रॉय, प्रमुख, सामाजिक कार्य विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय,

निदेशक, आजीवन शिक्षण संस्थान

दिल्ली विश्वविद्यालय,

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