“मकाँ से ला-मकाँ होते हुए भी… कहाँ हम हैं, कहाँ होते हुए भी।”
Even though it is from the place to the place...Where we are, where we are."

मलेरकोटला : 31 जनवरी
कल रात यहाँ अदब नवाज़ ग्रुप की ओर से एक ऑनलाइन आलमी मुशायरा (कवि दरबार) का आयोजन किया गया।
इसकी अध्यक्षता जावेद रहमानी (सी.ई.ओ. एवं एडिटर-इन-चीफ, जर्नलिज़्म टुडे ग्रुप तथा ग्रुप एडिटर, रोज़नामा सायबान, दिल्ली) ने की, जबकि विशेष अतिथि के रूप में प्रोफेसर अशफ़ाक शहीन, गुजरात (पाकिस्तान) शामिल हुए।
इसके अतिरिक्त विशिष्ट अतिथियों के रूप में सैयद रियाज़ रहीम (मुंबई), लेक्चरर बलबीर कौर रायकोटी (प्रधान, विश्व पंजाबी सभा) तथा जनाब हरजीत सोही (प्रसिद्ध लोक-गीतकार एवं गायक) उपस्थित रहे।
मुशायरे का शुभारंभ हरजीत सोही ने एक हम्दिया कलाम (ईश्वर की स्तुति का गीत) गाकर किया, जिसे श्रोताओं ने भरपूर सराहा। इसके पश्चात मुहम्मद अब्बास धालीवाल ने अपनी ग़ज़ल प्रस्तुत की। वहीं बलबीर रायकोटी ने अपनी दो पंजाबी कविताएँ प्रस्तुत कीं, जिन्हें श्रोताओं ने खूब पसंद किया। इसके बाद हरजीत सोही द्वारा एक गीत प्रस्तुत किया गया।
मुंबई से शामिल हुए वरिष्ठ शायर सैयद रियाज़ रहीम ने भी अपने कलाम से श्रोताओं से भरपूर दाद बटोरी। इस अवसर पर उनके इस शेर को विशेष सराहना मिली:
“मकाँ से ला-मकाँ होते हुए भी
कहाँ हम हैं, कहाँ होते हुए भी।”
मुशायरे के मुख्य अतिथि अशफ़ाक शहीन ने पंजाबी और उर्दू—दोनों भाषाओं में अपनी ग़ज़लों की प्रस्तुति दी, जिन्हें दर्शकों ने अत्यंत पसंद किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे जावेद रहमानी ने अदब नवाज़ ग्रुप पंजाब द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम की भूरि-भूरि प्रशंसा की। उन्होंने इस अवसर पर अपने दिवंगत पिता अतीक साहब की एक ग़ज़ल सुनाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। अपने अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने मुहम्मद अब्बास धालीवाल की प्रशंसा करते हुए कहा कि अब्बास धालीवाल बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी होने के साथ-साथ प्रतिभाशाली और मिलनसार व्यक्ति हैं। वे जहाँ कई विधाओं में लेखन करते हैं, वहीं ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन कर भाषाओं के साथ-साथ लोगों के आपसी संबंधों को मजबूत करने का सफल प्रयास कर रहे हैं। इस अवसर पर मंच संचालन की जिम्मेदारी मुहम्मद अब्बास धालीवाल ने कुशलता से निभाई।
