मनुष्य को आत्मा की सतत रक्षा करने का प्रयास करना चाहिये तभी जीवन सार्थक होगा – श्रमण मुनि अरिजित सागर 

Man should try to constantly protect his soul, only then life will be meaningful - Shramana Muni Arijit Sagar

परम पूज्य चर्या शिरोमणि आचार्य 108 श्री  विशुद्ध सागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य श्रमण मुनि श्री 108 अरिजित सागर ने स्थानीय महावीर भवन में अपने चातुर्मास प्रवास काल के अन्तर्गत श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर के प्रांगण में प्रतिदिन होने वाले दैनिक कार्यक्रम के दौरान अपने प्रवचन में लोगों को संबोधित करते हुए अपने आशीर्वचन में कहा कि ” संसार में हमें वही दिखाई देता है, जैसा हम नजरिया बना लेते है। जैसा हम चश्मा चढ़ा लेते हैं। सभी कुछ उसी रंग का दिखाई देने लगता है। जिनकी दृष्टि सिर्फ दूसरों की बुराई देखने के लिये तैयार रहती है। उन्हें संसार की अच्छाई में भी बुराई ही दिखाई पड़ती है, क्योंकि जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि दिखाई देती है। जो बुराइ‌यों से भरे है, उन्हें ही दूसरों की बुराई दिखाई देती है। जो लोग साफ होते है , उन्हें सफाई देने की आवश्यकत्ता नहीं पड़‌ती क्योंकि स्वच्छ वस्त्रों को कहीं भी साफ नहीं किया जाता हैं।
उन्होंने कहा कि जब फूलों से प्यार करते हैं तो फिर दूसरों की जीवन की बुराईयों के कांटे क्यों चुनते हैं? अपने चेहरे को देखने के लिये दर्पण की आवश्यकत्ता होती हैं। अपने चरित्र को देखने के लिये किसी चरित्रवान को देखना चाहिये क्योंकि जब हमारी दृष्टि अपने चरित्र को न देख सके तो किसी चरित्रवान की दृष्टि से उसे देखने में ही बुद्धिमानी है। हमें अपना दृष्टिकोण विराट बनाना होगा। परिवार में सुख शांति के लिये बहु में बेटी को देखना होगा |उन्होंने कहा कि जो जीवन शेष बचा है, उस शेष जीवन में अब अंदर झांकने का प्रयाना शूरू कर देना चाहिये। अपनी बुराईयों के कांटे अपने जीवन के चमन से निकाल लेने चाहिये तभी जीवन में अमन चैन होगा। यह जानकारी श्री  दिगंबर जैन मंदिर पंचायत के प्रचार – प्रसार विभाग द्वारा प्राप्त हुई है |
You might also like