डीयू के हिन्दी विभाग के शोधार्थियों द्वारा “रचयिता साहित्योत्सव” आयोजित

“Rachhayita Sahitya Utsav” organized by the researchers of DU’s Hindi department

भाषा को बोलने वाले ताकतवर होते हैं तो भाषा भी ताकतवर होती है: प्रो. योगेश सिंह

नई दिल्ली, 20 सितंबर।

दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के शोधार्थियों द्वारा संचालित संस्था “रचयिता” द्वारा दो दिवसीय रचयिता साहित्योत्सव का शुभारंभ डीयू कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने दीप प्रज्वलित करके किया। इस अवसर पर बतौर मुख्यातिथि संबोधित करते प्रो. योगेश सिंह ने कहा कि अगर किसी भाषा को बोलने वाले ताकतवर होते हैं तो भाषा अपने आप ताकतवर हो जाती है। आज भारत सशक्त हो रहा है तो हिन्दी भी मजबूत हो रही है।

साहित्योत्सव के उद्घाटन सत्र में “नए भारत में साहित्य और संस्कृति” विषय पर संबोधित करते हुए कुलपति ने कहा कि हिंदी भारतीय संस्कृति की आत्मा है। इस भाषा ने भारत के साथ-साथ संघर्ष किया है। हिंदी ने कभी भी देश को तोड़ने का काम नहीं किया, बल्कि हिंदी ने तो स्वतंत्रता संग्राम में बहुत बड़ा योगदान दिया। कुलपति ने कहा कि हिंदी जन-जन की भाषा है और मन-मन की भाषा है। यह सरकारों के सहयोग के बिना भी आगे बढ़ती रही और सरकारों के सहयोग से भी बढ़ती रही। अभी हिंदी का विशाल रूप दुनिया के सामने आना है। भारत विकसित राष्ट्र की ओर बढ़ रहा है और जब भारत विश्व का नेतृत्व करने की क्षमता में होगा तो यह हिंदी से ही होगा। साहित्य पर चर्चा करते हुए कुलपति ने कहा कि साहित्यकार व्यक्ति को अमर कर सकते हैं। शुभद्रा कुमारी चौहान ने अपनी कविताओं के माध्यम से झाँसी की रानी को झाँसी की रानी बनाया।

कुलपति ने वर्तमान में हिंदी के वैश्विक प्रसार पर चर्चा करते हुए कहा कि यूनिकोड के आने से हिंदी कंप्यूटर की भाषा बन गई है। अब हिंदी का वैश्विक विस्तार हो रहा है। उन्होंने हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों से आग्रह किया कि मंचीय कवियों और फिल्मों की स्क्रिप्ट लिखने वाले रचयिताओं का मज़ाक उड़ाना बंद करें। उनका भी हिंदी के विकास में बड़ा योगदान है। उनकी चीजें भी लोगों के मन में जाती हैं। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि के रूप में हंसराज कॉलेज की प्रिंसिपल प्रो. रमा, आर्ट्स फ़ैकल्टि के डीन प्रो. अमिताभ चक्रवर्ती, डीयू कल्चर काउंसिल के अध्यक्ष अनूप लाठर और हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. श्यौराज सिंह बेचैन सहित अनेकों शिक्षक और शोधार्थी उपस्थित रहे। कार्यक्रम के दूसरे सत्र में डीयू कल्चर काउंसिल के अध्यक्ष अनूप लाठर के साथ “लोक कला: अनुभव, परंपरा और चुनौतियाँ” विषय पर एक संवाद का आयोजन भी किया गया।

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