एक भारत श्रेष्ठ भारत का भी सबसे बड़ा जरिया है शास्त्रार्थ: अनुराग ठाकुर

Scholarly debate is also a major medium for 'Ek Bharat Shreshtha Bharat': Anurag Thakur

नई दिल्ली, 25 सितंबर।

दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के लॉ फैकल्टी के ‘फाइव-ईयर इंटीग्रेटेड लॉ कोर्स’ की ओर से, “अभिव्यक्ति: एशियन पार्लियामेंट्री डिबेट” के पहले संस्करण ‘अभिव्यक्ति 1.0’ के समापन समारोह का आयोजन विश्वविद्यालय के वाइसरीगल लॉज स्थित कन्वेंशन हॉल में हुआ। इस अवसर पर अनुराग ठाकुर (पूर्व केंद्रीय मंत्री और सांसद) बतौर मुख्य अतिथि उपस्थित रहे। समारोह की अध्यक्षता दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने की। अनुराग ठाकुर ने अपने संबोधन में डिबेट के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान और आध्यात्मिक परंपरा में शास्त्रार्थ का बहुत महत्व है। शास्त्रार्थ ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ का भी सबसे बड़ा जरिया है। कार्यक्रम के दौरान डिबेट प्रतियोगिता के विजेताओं को पुरस्कार भी वितरित किए गए।

अनुराग ठाकुर ने अपने संबोधन में आगे कहा कि शास्त्रार्थ की परंपरा केवल ऋषियों-मुनियों तक सीमित नहीं थी, मनुष्यों और देवताओं के बीच में भी शास्त्रार्थ हुए हैं। महाभारत के युद्ध में भगवान कृष्ण का युधिष्ठिर को गीता का ज्ञान देना, सावित्री द्वारा अपने तर्कों से यमराज को निरुत्तर कर देना आदि जैसे अनेकों उदाहरण भारतीय संस्कृति में शास्त्रार्थ के महत्व को प्रमाणित करते हैं। उन्होंने कहा कि “विकसित भारत 2047” संकल्प से सिद्धि की इस यात्रा को अगले दो दशकों में पूरा करना है। उन्होंने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि आपके हावभाव और जोश को देखकर लगता है कि दुनिया की कोई ताकत विकसित भारत के संकल्प को पूरा करने से नहीं रोक पाएगी।

सांसद अनुराग ठाकुर ने बदलते भारत की उपलब्धियां गिनवाते हुए कहा कि लंबे समय तक देश अंग्रेजों द्वारा बनाए गए क़ानूनों पर ही चलता रहा। अब भारत सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में अंग्रेजी समय के 1800 से ज्यादा क़ानूनों को निरस्त किया है। अंग्रेजों के बनाए आपराधिक कानूनों को बदलकर उनकी जगह भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के नए कानून बनाए हैं। अंग्रेजों के क़ानूनों की सोच दंड देने की थी, जबकि अब बीएनएस की सोच न्याय देने की है। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि शब्द, शास्त्र और शास्त्रार्थ ये तीन शब्द याद रखें। इसके साथ ही उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिये गए ‘पंच प्रण’ को अपनाने का आह्वान भी किया।

दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने अपने अध्यक्षयीय उद्बोधन में कहा कि विद्यार्थी ओपिनियन और फ़ैक्ट में फर्क करना सीखें। उन्होंने कहा कि फ़ैक्ट के लिए मेहनत करनी पड़ती है, उसके लिए पढ़ना पड़ता है, सोर्स तक जाना पड़ता है। किसी भी चीज की तह तक जाने के लिए फ़ैक्ट को समझना बहुत जरूरी है। प्रो. योगेश सिंह ने कहा कि डिबेट के तीन नियम हैं, प्रमाण दो, तर्क दो और हार को स्वीकार करो। कुलपति ने प्राचीन भारतीय ग्रन्थों से कुछ उदाहरण देते हुए कहा कि प्राचीन काल में जब दुनिया के बड़े हिस्से में सवाल पूछना एक अपराध था, तब भी भारत में इसे अच्छा माना जाता रहा। उन्होंने विद्यार्थियों का उत्साह वर्धन करते हुए कहा कि आपने केवल डिबेट में हिस्सा नहीं लिया, बल्कि तीन हजार वर्ष पुरानी भारतीय परंपरा में हिस्सा लिया है। प्रो. योगेश सिंह ने डिबेट में असहमति के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि भारतीय संविधान को बनाने में दो वर्ष लगे, अगर सभी एक दूसरे से सहमत होते क्या इतना समय लगता? इसी का प्रतिफल है कि इतना अच्छा संविधान हमारे सामने है। इस अवसर पर दक्षिणी परिसर की निदेशक प्रो. रजनी अब्बी, रजिस्ट्रार डॉ. विकास गुप्ता, लॉ फैकल्टी की डीन प्रो. अंजू वाली टिक्कू और फाइव-ईयर इंटीग्रेटेड लॉ कोर्स के निदेशक प्रो. एल. पुष्पा कुमार आदि सहित भारत भर के प्रतिष्ठित संस्थानों से भारी संख्या में विद्यार्थी, फैकल्टी और कानूनी पेशेवर उपस्थित रहे।

कार्यक्रम के आरंभ में लॉ फैकल्टी की डीन प्रो. अंजू वाली टिक्कू ने स्वागत उद्बोधन प्रस्तुत किया और फाइव-ईयर इंटीग्रेटेड लॉ कोर्स के निदेशक प्रो. एल. पुष्पा कुमार ने डिबेट प्रतियोगिता ‘अभिव्यक्ति 1.0’ के बारे में विस्तृत जानकारी दी। कार्यक्रम की समन्वयक डॉ मन्नत ने बताया कि ‘अभिव्यक्ति’ के इस पहले संस्करण में देश भर के पचास से अधिक कॉलेजों और विश्वविद्यालयों ने भाग लिया है। 10 और 11 सितंबर, 2026 को इसके शुरुआती दौर ऑनलाइन आयोजित किए गए थे, और एडवांस राउंड 22 सितंबर, 2026 को डीयू कैंपस में आयोजित हुए।

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